एचआईवी मरीजों में टीबी रोगी होने की संभावना अधिक, 2019 से अब तक 0.74 फीसदी मरीजों में मिली दोनों बीमारियां



गोरखपुर। ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) वह वायरस है जो एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंसी सिंड्रोम (एड्स) बीमारी का कारण बनता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण एचआईवी मरीजों में टीबी होने की आशंका कहीं अधिक होती है। इसकी वजह से प्रत्येक एचआईवी मरीज की टीबी जांच जरूरी है और अगर वह टीबी मरीज नहीं होते हैं तब भी उन्हें छह माह तक टीबी से बचाव की दवा खाना अनिवार्य है। गोरखपुर जिले में वर्ष 2019 से अब तक 0.74 फीसदी मरीजों में एचआईवी-एड्स और टीबी दोनों बीमारियां मिली हैं। जिला एड्स नियंत्रण और क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव ने बताया कि वर्ष 2019 से अब तक टीबी के 71103 नये रोगी ढूंढे गये। इनमें से 528 मरीज ऐसे पाए गये जिन्हें दोनों बीमारियां थीं। एचआईवी से ग्रसित टीबी मरीजों के ठीक होने में समय लगता है और उन्हें जटिलताएं भी कहीं ज्यादा होती हैं, लेकिन समय से इस सहरूग्णता की पहचान हो जाए तो ऐसे टीबी मरीज भी जल्दी ठीक हो सकते हैं। इसी वजह से टीबी की पहचान होने पर प्रत्येक मरीज की एचआईवी जांच और प्रत्येक एचआईवी मरीज की टीबी जांच अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग प्रत्येक टीबी मरीज की एचआईवी जांच करवाता है। एचआईवी की पुष्टि होने पर टीबी और एचआईवी की दवा साथ-साथ चलती है। ऐसा करने से एचआईवी ग्रसित टीबी मरीज ठीक हो जाता है और उसका जटिलताओं से भी बचाव होता है। निजी अस्पतालों में इलाज करवाने वाले टीबी मरीजों को भी चिकित्सक की सहमति से इस जांच की सुविधा सरकारी अस्पतालों में दी जा रही है। एचआईवी ग्रसित टीबी मरीजों के जीवनसाथी की भी जांच कराई जाती है। बताया कि इस वर्ष 316 एचआईवी मरीजों को टीबी से बचाव की दवा खिलाई गई। जिन टीबी मरीजों को एचआईवी भी है, उनके टीबी का इलाज पूरा होने के बाद उन्हें भी छह माह तक टीबी से बचाव की दवा खिलाते हैं। लेकिन अगर ऐसे मरीज ड्रग रेसिस्टेंट टीबी मरीज हैं तो उन्हें बचाव की दवा नहीं खिलाई जाती है। बताया कि इस समय जनपद में एचआईवी के 5672 सक्रिय मरीज हैं। इस वित्तीय वर्ष में 436 नये एचआईवी मरीज पंजीकृत किये गये। इलाज के दौरान दस एचआईवी मरीजों की मौत भी हुई है। 57 ऐसे एचआईवी मरीज पंजीकृत किये गये हैं, जिनमें टीबी की भी बीमारी निकली है। इन मरीजों को दोनों प्रकार की दवाएं साथ-साथ खिलाई जा रही हैं। डॉ यादव ने बताया कि जब कोई व्यक्ति कई वर्षों तक एचआईवी वायरस से पीड़ित रहता है और उसका उपचार नहीं होता है तो वह एड्स मरीज बन जाता है। यदि एचआईवी मरीज एड्स का रोगी बन जाता है, तो उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली रोगाणुओं से अच्छी तरह से नहीं लड़ पाती। यही वजह है कि एड्स से पीड़ित लोगों को अक्सर गंभीर संक्रमण और स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं।