समस्याओं के उचित प्रबंधन से मां और शिशु को जीवनदान दे रही है पिपराईच की सीएचसी, प्रसूताओं ने बताई गाथा





गोरखपुर। समय रहते सही हस्तक्षेप से जटिलताओं का प्रबन्धन कर मां और नवजात शिशु की जान बचाई जा सकती है। पिपराईच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) इस मामले में मिसाल बनने लगा है। बीते तीन माह के दौरान यहां कई जटिल प्रसव के कुशल प्रबन्धन किये गये, जिससे मां और बच्चे दोनों खुशहाल जीवन जी रहे हैं। यह सीएचसी एक प्रथम संदर्भन इकाई भी है। सरकार की पहल पर कुशल चिकित्सकों की तैनाती और स्टॉफ के निरंतर प्रशिक्षण के कारण यहां सुरक्षित प्रसव संभव हो रहा है। सीएचसी पर जटिल प्रसव के मामलों में प्राथमिक हस्तक्षेप और प्रबंधन कर आवश्यकतानुसार जच्चा बच्चा मेडिकल कॉलेज रेफर किये जा रहे हैं। पिपराईच ब्लॉक के महमूदाबाद उर्फ मोगलापुर से आई चंदा के पहले बच्चे का जन्म सीएचसी पर पांच अक्टूबर को हुआ। यह एक पोस्ट डेटेड डिलीवरी थी, जिसकी वजह से बच्चे के पेट में गंदगी चली गई थी। बच्चे ने जब जन्म लिया तो उसके शरीर में कोई हरकत नहीं थी। चंदा बताती हैं कि अस्पताल के स्टॉफ ने तुरंत बच्चे का इलाज शुरू कर दिया। थोड़ी देर में शरीर में हरकत आ गई लेकिन बच्चा रो नहीं रहा था। एम्बुलेंस की मदद से उन्हें और उनके बच्चे को मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया जहां दो दिन के इलाज से बच्चा ठीक हो गया। उनका बेटा आदित्य (दो माह) अब पूरी तरह से स्वस्थ है। अस्पताल की स्टॉफ नर्स संध्या मधई का कहना है कि प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ मणि शेखर की देखरेख में अस्पताल के सभी स्टॉफ का निरंतर क्षमता संवर्धन किया जाता है। हमें प्रशिक्षित किया गया है कि रेफरल करने से पहले वह सभी हस्तक्षेप करने हैं जो जीवन बचाने के लिए जरूरी हैं। चंदा के बच्चे ने जब जन्म लिया तो उन्होंने एनबीएसयू की स्टॉफ नर्स रवीना के साथ मिल कर रिसेसिटेशन की प्रक्रिया पूरी की। मुंह और नाक के जरिये बच्चे के भीतर की गंदगी को साफ किया गया। यह हस्तक्षेप जन्म के 30 मिनट के अंदर होना चाहिए। इसी ब्लॉक की गढ़वा से आईं सीमा देवी का प्रसव तीन अक्टूबर को हुआ। प्रसव के बाद ब्लीडिंग शुरू हो गई और झटके आने लगे। निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार अधीक्षक को सूचना दी गई। पूरी टीम ने पीपीएच किट के जरिये इस जटिलता का प्रबंधन किया और महिला की स्थिति सामान्य होने पर उसे मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। अधीक्षक ने बताया कि मां को इस खतरे से बचाने के लिए ही प्रसव के बाद 48 घंटे तक अस्पताल में रहने की ही सलाह दी जाती है। अस्पताल पर प्रसव पूर्व, प्रसवकालीन और प्रसव के बाद की जटिलताओं से निपटने के मुकम्मल इंतजाम हैं। पिपराईच के भगवानपुर भैंसहा गांव की ज्योति इसी वर्ष जनवरी के दूसरे पखवाड़े में गर्भवती हुईं। आशा कार्यकर्ता द्रौपदी की मदद से जब वह प्रसव पूर्व जांच के लिए आईं तो उनका हीमोग्लोबिन 2.16 ग्राम था। उन्हें प्राथमिक इलाज कर तुरंत मेडिकल कॉलेज भेजा गया, जहां ब्लड चढ़वाने के बाद वह वापस लौटी। आशा कार्यकर्ता और सीएचसी ने उनका लगातार फॉलो अप किया। उन्हें अस्पताल से पोषण पोटली दी गयी और आयरन कैल्शियम भी मुहैय्या कराया गया। बीच-बीच में हीमोग्लोबिन के स्तर की जांच की गई और आवश्यकतानुसार आयरन सुक्रोज भी चढ़ाया गया। अक्टूबर तक उनमें खून की मात्रा 9.7 ग्राम हो गई। इसके बाद विशेषज्ञ चिकित्सकों की मौजूदगी में सीएचसी पर ही उनकी सुरक्षित प्रसव कराया गया। अधीक्षक ने बताया कि उनके यहां औसतन 150-200 संस्थागत प्रसव प्रति माह होते हैं। इनमें से 30 से 35 प्रसव ऑपरेशन से किये जाते हैं। प्रत्येक माह एक से दो प्रसूताओं और दो से तीन शिशुओं में जटिलताओं का प्रबंधन किया जा रहा है। इस कार्य में जिला मातृ स्वास्थ्य परामर्शदाता डॉ सूर्य प्रकाश का भी निरंतर सहयोग मिल रहा है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि जिले में करीब 4500 प्रसव हर माह सिर्फ सरकारी अस्पतालों में हो रहे हैं। इनमें से दस फीसदी प्रसव जटिल होते हैं, लेकिन अगर 102 नंबर एम्बुलेंस की मदद से समय से प्रसूता को अस्पताल लाया जाए तो शीघ्र हस्तक्षेप से इनका प्रबन्धन हो सकता है। मां और बच्चे को खतरे से बचाने के लिए प्रसव पूर्व जांचें अवश्य कराएं और निरंतर आशा कार्यकर्ता के सम्पर्क में रहें। जिले की पिपराईच, सहजनवां, बांसगांव, कैम्पियरगंज, बड़हलगंज और चौरीचौरा प्रथम संदर्भन इकाई में विशेषज्ञ चिकित्सकों और बाल रोग विशेषज्ञों की मदद से मां और नवजात शिशु को नया जीवन दिया जा रहा है।



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