सैदपुर : 165 साल बाद पूर्वजों की निशानियां ढूंढते नारायणपुर ककरहीं पहुंचे अफ्रीकी राजदूत, न मिलने पर साथ ले गांव की माटी

सैदपुर। कहते हैं आप दुनिया में कहीं भी चले जाएं लेकिन वतन की माटी की याद आ ही जाती है। इस बात का प्रमाण रविवार को नारायणपुर ककरहीं में देखने को मिला। बात उस समय की है, जब आज की तरह हवाई सफर की व्यवस्था नहीं थी। तब का जमाना पानी वाली जहाज से दुनिया के गैर मुल्कों तक का सफर तय कर रहा था। इंसानी जिंदगी अपने हालात और रोजी-रोटी की कैफियत वाली जज्बातों के चलते अपना ठौर-ठिकाना तकरीबन किरायेदार की तरह बदलती रहती है। ऐसे ही हालात में गाजीपुर जिले के सैदपुर तहसील क्षेत्र के नारायणपुर ककरहीं निवासी रामलखन यादव 25 वर्ष की अवस्था में ही आज से लगभग 165 वर्ष पूर्व हफ्तों का सफर तय करते हुए 1860 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे। तब आज की तरह हवाबाजी करती उड़ानें भी नहीं थी। सफर के लिए बस पानी के जहाज ही साधन थे। वर्तमान में उनकी संतति दक्षिण अफ्रीका की मूल निवासी के रूप में बस चुकी हैं और उनकी छठीं पुश्त के प्रो. अनिल सुकलाल नई दिल्ली स्थित दूतावास में दक्षिण अफ्रीका के राजदूत के रूप में तैनात हैं। 6 पुश्तों के बाद वो अपनी पीढ़ियों व परदादा की निशानियां खोजते हुए अपनी पत्नी के साथ गांव पहुंचे। जहां ग्रामीणों ने गुलदस्ता देकर व माल्यार्पण कर उनका भव्य स्वागत किया। 165 साल के बाद उनकी पीढ़ी से किसी के गांव पहुंचने पर ग्रामीण बेहद खुश हो गए। गांव में पहुंचने पर सामाजिक संस्था शिव शिवा स्नेह संस्था के संस्थापक व पर्यावरण प्रेमी उमेश श्रीवास्तव ने नील कमल डोंगरा के साथ उनका गांव में स्वागत करने के बाद उनके साथ गांव में हर जगह जाकर उनके पूर्वजों की निशानियों को जोड़ने का प्रयास किया लेकिन उनके परदादा की गांव में मौजूद वर्तमान पीढ़ी का पता नहीं चल सका। ऐसे में उमेश श्रीवास्तव ने के साथ उन्होंने गांव स्थित डीह बाबा स्थल पर जाकर दर्शन पूजन किया और माथा टेका। उनकी पत्नी भी गाजीपुर के ही लोनीपुर की निवासिनी हैं और वो पत्नी के साथ गांव आए थे। प्रो. अनिल और उनकी पत्नी अपने पूर्वजों को खोजते दक्षिण अफ्रीका से 165 साल बाद अपने मूल गांव सैदपुर के नारायणपुर ककरहीं पहुंचे। प्रो. अनिल 5 साल से ही इस प्रयास में लगे थे कि उनके पूर्वज कहां व किस गांव के निवासी थे। किसी तरह से पता चला कि वो नारायणपुर ककरहीं निवासी थे। जिसके बाद दोनों गांव पहुंचे। उन्होंने बताया कि 165 साल पूर्व 1860 में उनके पूर्वज रहे रामलखन यादव दक्षिण अफ्रीका चले गए थे। तभी से वहीं बस गए। अब हम सभी अपने पूर्वजों की जन्मभूमि पर आए हैं। उमेश श्रीवास्तव के साथ उन्होंने गांव में जाकर डीह बाबा स्थल पर पूजा अर्चना की और गांव में जाकर पूर्वजों का पता लगाया। लेकिन पूर्वजों का पता नहीं चला। हालांकि उमेश श्रीवास्तव ने कहा कि काफी खोजबीन की जाएगी और गांव के बुजुर्गों से पता लगाने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि 165 साल पूर्व की पीढ़ी का मौजूद होना करीब असंभव के समान है लेकिन फिर भी पता लगाने का पूरा प्रयास किया जाएगा। इसके बाद अपने गांव की मिट्टी लेकर अफ्रीकी राजदूत गंगा घाटों के किनारे पहुंचे और वहां का जायजा लिया। वहां से वो भितरी स्थित स्कंदगुप्त के साम्राज्य के ऐतिहासिक अवशेषों का निरीक्षण करने पहुंचे और वहां का नजारा देखा। वहां से वो पवहारी बाबा स्थल पर पहुंचे और वहां पूजा अर्चना करने के बाद गांव की मिट्टी लेकर वापस दिल्ली रवाना हो गए। इस बाबत उमेश श्रीवास्तव ने बताया कि हम सभी उनके पूर्वजों का पता लगाने में जुटे हैं, पता चलने पर उन्हें जानकारी दे दी जाएगी।




